खेती-किसानी

पीले तरबुज की खेती : लागत से 3 गुना मिलता है फायदा, इसकी खेती के बारे में जानिए

पाइन एप्पल के टेस्ट वाले पीले तरबूज की खेती कैसे की जाती है इससे कितना फायदा मिलता है जानिए सबकुछ।

Peele tarbuj ki kheti : गर्मियों में शरीर के लिए लाभदायक तरबूज अलग-अलग वैरायटीयों में उपलब्ध होने लगे हैं। अधिक फायदे के लिए किसान और विदेशी तरबूज की खेती करना भी पसंद कर रहे हैं ऐसी ही एक खेती है पीले तरबूज की। मध्य प्रदेश के कई किसानों ने इस वर्ष पीले तरबूज की खेती की। पीले तरबूज के बीज इन्होंने ताइवान से मंगाए और अच्छा मुनाफा कमाया।

मध्य प्रदेश के धार जिले में बदनावर के ढोलाना गांव में किसान ललित व मुकेश रामेरिया ने खेत पर यह विशेष तरबूज उगाया है। गर्मियों के मौसम में लोग पीले रंग के इन तरबूज का खूब आनंद ले रहे हैं। लाल तरबूज की तुलना में यह स्वादिष्ट भी ज्यादा है। इसकी खेती के बारे आप भी जानिए।

पीले तरबुज की खेती कैसे करें (Peele tarbuj ki kheti)

किसानों ने बताया कि पीले तरबूज की खेती के लिए मालवा की मिट्टी उपयुक्त है। उन्होंने एक ही खेत में अलग अलग वैरायटी के तरबूज लगाए गए थे। कुछ वैरायटीयां गर्मी व वायरस से खराब हो गई। अंदर से पीले रंग वाली नई किस्म ठीक रही। इसका स्वाद नया होने से पहला प्रयास अच्छा रहा। मालवा की उपजाऊ जमीन में पहली बार में ही अच्छी पैदावार हुई है। मप्र के तरबूज की एक खास किस्म स्वाद लेने वालों को हैरान कर रही है। इस तरबूज को खाने पर पाइनएप्पल का स्वाद आता है। अंदर से पीले रंग का यह तरबूज लोगों को काफी पसंद आ रहा है। इंदौर के साथ ही दिल्ली में इसकी अच्छी मांग है।

खेती के लिए जलवायु और मिट्टी

सामान्य तौर पर तरबूजे की खेती के लिए अधिक तापमान वाली जलवायु सबसे अच्छी मानी जाती है। अधिक तापमान से फलों की वृद्धि अधिक होती है। बीजों के अंकुरण के लिए 22-25 डिग्री सेटीग्रेड तापमान अच्छा रहता है। इसकी खेती के लिए मिट्टी की तो रेतीली और रेतीली दोमट भूमि इसके लिए सबसे अच्छी रहती है। वहीं मिट्टी का पी. एच. मान 5.5-7.0 के बीच होना चाहिए। बता दें कि इसकी खेती अनुपजाऊ या बंजर भूमि में भी की जा सकती है। यही जलवायु एवं मिट्टी पीले तरबूज की खेती के लिए भी उपयुक्त मानी गई है।

खेत की तैयारी कैसे करें (khet ki taiyari kaise karen)

खेती की पहली जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से करनी चाहिए। इसके बाद देसी हल या कल्टीवेटर से जुताई की जानी चाहिए। इस बात का ध्यान रखे कि खेत में पानी की मात्रा कम या ज्यादा नहीं हो। इसके बाद नदियों के खाली स्थानों में क्यारियां बना लें। अब भूमि में गोबर की खाद को अच्छी तरह मिला दें। यदि रेत की मात्रा अधिक है, तो ऊपरी सतह को हटाकर नीचे की मिट्टी में खाद मिलाना चाहिए।

बुवाई का तरीका

मैदानी क्षेत्रों में इसकी बुवाई समतल भूमि में या डौलियों पर की जाती है, जबकि पर्वतीय क्षेत्रों में बुवाई कुछ ऊंची उठी क्यारियों में की जाती है। क्यारियां 2.50 मीटर चौङी बनाई जाती है उसके दोनों किनारों पर 1.5 सेमी. गहराई पर 3-4 बीज बो दिए जाते है। थामलों की आपसी दूरी भूमि की उर्वरा शक्ति पर निर्भर करती है। वर्गाकार प्रणाली में 4 गुणा 1 मीटर की दूरी रखी जाती है पंक्ति और पौधों की आपसी दूरी तरबूज की किस्मों पर निर्भर करता है।

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खाद एवं उर्वरक का प्रयोग

गोबर की खाद 20-25 ट्रौली को रेतीली भूमि में अच्छी तरह से मिला देना चाहिए। यह खाद क्यारियों में डालकर भूमि तैयारी के समय मिला देना चाहिए। 80 कि.ग्रा. नत्रजन प्रति हैक्टर देना चाहिए तथा फास्फेट व पोटाश की मात्रा 60-60 कि.ग्रा. प्रति हैक्टर की दर से देनी चाहिए। फास्फेट व पोटाश तथा नत्रजन की आधी मात्रा को भूमि की तैयारी के समय मिलाना चाहिए तथा शेष नत्रजन की मात्रा को बुवाई के 25-30 दिन के बाद देना चाहिए। खाद उर्वरकों की मात्रा भूमि की उर्वरा शक्ति पर निर्भर करती है। उर्वरा शक्ति भूमि में अधिक हो तो उर्वरक व खाद की मात्रा कम की जा सकती है।

सिंचाई प्रबंधन

पीले तरबूज की खेती (Peele tarbuj ki kheti) में बुवाई के करीब 10-15 दिन के बाद सिंचाई की जानी चाहिए। वहीं यदि आप इसकी खेती नदियों के किनारों पर कर रहे है तो सिंचाई की आवश्यकता नहीं पड़ती है। क्योंकि यहां की मिट्टी में पहले से ही नमी बनी हुई रहती है।

पीले तरबूज ताइवानी बीज

पीला तरबूज ताइवान का बीज है। इस बीज के भाव 70 हजार रुपए किलो है। एक बीघा जमीन में 250 ग्राम बीज की आवश्यकता होती है। यह तरबूज अनमोल हाइब्रिड किस्म का है। यह बेहद मीठा और रसीला भी है। पीला तरबूज सामान्य तरबूज की भांति ही बाहर से हरा दिखायी देता है. लेकिन उसे काटने पर अंदर से पीला गुदा निकलता है, जो खाने में रसदार और काफी मीठा होता है. एक एकड़ में करीब 150 क्विंटल तक खरबूजा हाेता है।

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तरबूज की अन्य उन्नत किस्में

Peele tarbuj ki kheti : तरबूज की कई उन्नत किस्में होती है जो कम समय में तैयार हो जाती है और उत्पादन भी बेहतर देती हैं। इन किस्मों में प्रमुख किस्मेें इस प्र्रकार से हैं-

शुगर बेबी : इस किस्म के फल बीज बोने के 95-100 दिन बाद तोड़ाई के लिए तैयार हो जाते है, जिनका औसत भार 4-6 किलोग्राम होता है। इसके फल में बीज बहुत कम होते है। इस किस्म से प्रति हैक्टेयर 200-250 क्विंटल तक उपज प्राप्त की जा सकती है।

अर्का ज्योति : इस किस्म का विकास भारतीय बागवानी अनुसंधान संस्थान, बंगलौर किया गया है। इस किस्म के फल का भार 6-8 किलोग्राम तक होता है। इसके फलों की भंडारण क्षमता भी अधिक होती है। इस किस्म से प्रति हेक्टेयर 350 क्विंटल तक उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है

आशायी यामातो : यह जापान से लाई गई किस्म है। इस किस्म के फल का औसत भार 7-8 किलोग्राम होता है। इसका छिलका हरा और मामूली धारीदार होता है। इसके बीज छोटे होते है। इस किस्म से प्रति हेक्टेयर 225 क्विंटल तक उपज प्राप्त की जा सकती है।

डब्लू. 19 : यह किस्म एन.आर.सी.एच. द्वारा गर्म शुष्क क्षेत्रों में खेती के लिए जारी की गई है। यह किस्म उच्च तापमान सहन कर सकती है। इससे प्राप्त फल गुणवत्ता में श्रेष्ठ और स्वाद में मीठा होता है। यह किस्म 75-80 दिन में तैयार हो जाती है। इस किस्म से प्रति हेक्टेयर 46-50 टन तक उपज प्राप्त की जा सकती है।

पूसा बेदाना : इस किस्म की सबसे बङी विशेषता यह है कि इसके फलों में बीज नहीं होते हैं। फल में गूदा गुलाबी व अधिक रसदार व मीठा होता है यह किस्म 85-90 दिन में तैयार हो जाती है।

अर्का मानिक : इस किस्म का विकास भारतीय बागवानी अनुसंधान संस्थान, बंगलौर द्वारा किया गया है यह एन्थ्रेक्नोज, चूर्णी फफूंदी और मृदुरोमिल फफूंदी की प्रतिरोधी किस्म है प्रति हेक्टेयर 60 टन तक उपज दे देती है।

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राधेश्याम मालवीय

मैं राधेश्याम मालवीय Choupal Samachar हिंदी ब्लॉग का Founder हूँ, मैं पत्रकार के साथ एक सफल किसान हूँ, मैं Agriculture से जुड़े विषय में ज्ञान और रुचि रखता हूँ। अगर आपको खेती किसानी से जुड़ी जानकारी चाहिए, तो आप यहां बेझिझक पुछ सकते है। हमारा यह मकसद है के इस कृषि ब्लॉग पर आपको अच्छी से अच्छी और नई से नई जानकारी आपको मिले।
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